रोज


  रोज कत्ल करता हूँ,चुन चुन के,

शुक्र है,

मेरे ख्वाब मुकदमा दर्ज़ नहीं करते,


क्या बचा है अब मेरे आलिंद मे ?

एक मै हकीकत से परेशान हूँ,

एक यह भंवरे फर्ज़ नहीं करते,


अपनो ने लूटा है कुछ एसा,

के अब हम,

धडकनों पे भी साँसें खर्च नहीं करते ।।

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